Tuesday, November 22, 2011

kashmakash



                         कशमकश
 

  • प्रभाजॅन
जीवन तॉ जी रहे हैं ।जिजीविशा है। प्राएी का लक्ष्‍ण्‍है जीना। कश्‍मकश्‍ भ्‍री तनाव भ्‍री जिन्‍दगी है सभी के पास । कुछ करके भी आत्‍म संतोष्‍ जैसा कुछ नहीं। सत्‍य अज्ञानता से परे या इश्‍वरीय शक्ति में गौण्‍ रूप से निवास कर रहा है।जरूरत है पूरी कर भी ली तब भी मन में अशांती ।एक सत्‍यक्‍या है क्‍या है उसका स्‍वरूप ।
  पौराण्कि संस्‍क्रति को देख्‍ते हें तब कुछ और ही लगता है। राजा दशरद्‍थ्‍ के तीन पत्‍नी क्रष्‍ण के हजारों रानियां के बाबजूद भी राधा से उसका निस्‍वाथॅ प्रेम था जिसे आज भी पूज्‍यनीय मानते हैं उस जमाने में राजाओं का अनेक पत्‍नी होना अच्‍छा माना जाता था ।हिन्‍दु राजा अनेक बहु पत्‍नी धारी थे ।संस्‍क्रति तब भी थी आज भी है।आज एक पत्‍नी  एक पति को बहुमान मिलता है। समाज में बहु का चलन नहीं है कानून भी इसे अपराध मानता हैं।
सिथति ये है कि जो काम खुले आम गालत है वो चोरी छिपे होता है होता जरूर है। इसमें दोषी कौन  प्रेम तो आज भी है उसे देखने वालों की द्रष्ठि में खोट है ।यौवन में यदि लडका लडकी प्रेम करते हैं तो माता पिता समाज की क्रूरता का शिकार होकर अलग शादी करने पर मजबूर कर दिया जाता है। अब मन से वो पहले किसी ओर की थी ।शादीउपरान्‍त किसी ओर की।पूणॅ इमानदारी से यदिवो शादी के रिश्‍ते को निभती है तब भी उसके मन के किसी कोने में एक मलाल रह जाता है कि वो सतीत्‍व की धनी नहीं है।इसमें दोषी कौन ।इस्‍लाम में कहीं ये नहीं लिखा कि एक पुरूष दो तीन शादी कर सकता है। हां यदि शोध्‍ से ये पता चालता है कि नारियों के आंकडे दुगुने हैं तो समाज में अव्‍यवस्‍था न हो इसके लिए एक मुसलमान दो तीन पत्‍नी रखकर स्‍वंय को तोष देता है कि उसने समाज में व्‍यवस्‍था बनाये रखने में अपनी अहम भूमिका दजॅ की। सवाल हिन्‍दु या मुसलमान संस्‍क्रति का नहीं ।मानवता का है सत्‍य का है।
  यदि एक पत्‍नी रखना सही है मयॉदानुसार है तो हिन्‍दु राजाओं का बहु पत्‍नी का क्‍या ़  ।शादी के बाद भी पति पत्‍नी के मध्‍य यदि भावनाओं का तालमेल न होता हो तब तलाक की छुट है फिर शादी दूसरी या कभी ऐसा भी होता है कि पति की म्रत्‍यु के बाद दूसरी शादी विधवा विदूर की दूसरी शादी का प्रावधन है तब क्‍या उनकी मयादॉ संस्‍कार या सतीत्‍व प्राइज़ रहता है। शदी के बाद यदि किसी को दुसरे से प्रेम हो जाये तब भी क्‍या उनकी नैतिक मयॉदा जीवित रहती है भले ही उनका रिश्‍ता पवित्र रहा हो ।
हम जीवन जी रहे हैं क्‍योंकि सांसें चल रही है ।परन्‍तु कशमकश व उलझन नित नइ समस्‍याओं को जन्‍म देता है। प्राण्‍ विहिन जीवन व्‍यथॅ ही समस्‍या पैदा करता है । रोज नये सवाल हमें आ घेरते हैं । सत्‍य हमारे ज्ञान से परे हैं। कुछ नया जानने की चाह में हम स्‍वंय ही उलझते जा रहें हैं ।
आज समाज में जो भी गतिविधियां चल रही है उससे निष्‍कष्‍ॅ निकालना आवश्‍यक है। स्‍कूल काूलेजों में मुक्‍त प्रेम का जोर जिसमें समपिॅत प्रेम तो गौण हो जाता है।अश्‍लीलता वासना शरीर की भूख में इश्‍वरीय प्‍यार तो है ही नहीं। शादी के बाद बडी उम्र में किसी से प्रेम होना यह सब इश्‍वरीय लीला का अंश है तो संदेह व रोष किस बात का करो मुक्‍त भावों से उन्‍मुक्‍त प्रेम परन्‍तु कुछ ओर है ये तो दोषी कौन  

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